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जीव उस कुत्ते के समान है जो भूखवश भोजन पाने के लिए द्वार-द्वार जाता है..."*

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जीव उस कुत्ते के समान है जो भूखवश भोजन पाने के लिए द्वार-द्वार जाता है..."*

*बाबूजी सुशील कुमार सरावगी जिंदल जी के उद्बोधन का मर्म* 🙏🏻

*"जीव उस कुत्ते के समान है जो भूखवश भोजन पाने के लिए द्वार-द्वार जाता है..."*

यह दृष्टांत *श्रीमद्भागवत 3.30.14* के भाव पर आधारित है, जहाँ जीव की तुलना आवारा कुत्ते से की गई है। बाबूजी ने इसे आज के संदर्भ में बहुत सरल भाषा में समझाया है।

*उद्बोधन का सार - 3 चरणों में*

*1. बचपन की प्रार्थना का अर्थ देर से समझना*  
_"तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो..."_  
स्कूल में गाते थे, पर समझ नहीं थी। माँ-बाप, भाई-सखा सब साथ थे।  
धीरे-धीरे सब बिछड़ गए। तब समझ आया - *कालक्रम में सब रिश्ते छूट जाते हैं, रह जाता है केवल भगवान से रिश्ता।*

*2. आवारा कुत्ता vs पालतू कुत्ता = मालिक-विहीन जीव vs शरणागत जीव*
**आवारा कुत्ता = अहंकारी जीव** **पालतू कुत्ता = शरणागत जीव**
कोई मालिक नहीं, खुद को मालिक समझे मालिक का आसरा, मालिक को मालिक माने
द्वार-द्वार भटके, कूड़ा सूंघे, भूखा रहे मालिक गोद में बैठाए, नहलाए, बिस्किट खिलाए
दूसरे कुत्तों से लड़े, घायल हो मालिक रक्षा करे, टीका लगवाए
दुत्कारा जाए, लाठी खाए, गैरेज में छिपे मालिक घुमाने ले जाए, प्यार करे
भोजन की गारंटी नहीं भोजन-आवास-चिकित्सा सब निश्चित
*3. जीवात्मा पर लागू*  
जो जीव *"मैं करता हूँ"* के अहंकार में भगवान को मालिक नहीं मानता, वह 84 लाख योनियों में आवारा कुत्ते सा भटकता है - कभी सुख, कभी दुःख, कभी दुत्कार, कभी थोड़ा टुकड़ा।

पर जो जीव *"तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो"* मानकर भगवान का _pet_ बन जाता है, शरण में आ जाता है, उसकी सारी चिंता मालिक ले लेता है। उसे आध्यात्मिक लोक में नित्य आनंद मिलता है।

*केंद्रीय संदेश*
*मालिक बनोगे तो भटकोगे, मालिक का बनोगे तो मौज करोगे।*

गीता 18.66 में भगवान ने यही कहा: _"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"_ - सब छोड़कर मेरी शरण आ जा, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा।

*व्यावहारिक सूत्र*
1. *रिश्ते निभाओ, पर आसक्ति मत रखो* - सब काल के अधीन हैं।
2. *पुरुषार्थ करो, पर कर्तापन छोड़ो* - "तुम्ही कराते हो" भाव रखो।  
3. *द्वार-द्वार मत भटको, एक द्वार पकड़ो* - एक इष्ट, एक मंत्र, एक आसरा।

बाबूजी का यह दृष्टांत हमें झकझोरता है कि हम आवारा तो नहीं बन गए? क्या हमने मालिक चुन लिया है या अब भी कूड़ा सूंघ रहे हैं?

*"कोई न अपना सिवा तुम्हारे"* - जब यह गले उतर जाए, जीवन का भटकना बंद हो जाता है।

*जय श्री राम | जय श्री कृष्ण* 🙏🏻  
_डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय विचार मंच, नई दिल्ली_  
_धर्ममूर्ति बाबूजी सुशील कुमार सरावगी जिंदल 9414402558_

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